हॅंसके जीने का अदाकार तो मैं हूॅं आला ,

पर मेरे दिल में ग़मों का गुबार पलता है ।।

ख़ुद बख़ुद बज़्म में ज्यों क़हक़हे निकल जाऍं ,

वैसे ख़ल्वत में न टाले से रोना टलता है ।।

सब ये समझें कि सुखी हूॅं मैं देखकर मुखड़ा ,

उनके पूछे भी बताऊॅं न मैं मेरा दुखड़ा ,

होके बारिश में खड़ा रोऊॅं इसलिए मेरी ,

अश्क़बारी का किसी को पता न चलता है ।।

( आला = उच्च कोटि का / बज़्म = सभा , महफ़िल / ख़ल्वत = एकांत , तनहाई / अश्क़बारी = रुदन )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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