तोहफा

अपने दीदार की जब दें वो इजाज़त तो लगे , जैसे अंधे को मिला तोहफा दो ऑंखों का ।। और जब चूमने बोलें तो लगे हाय यही , जैसे उड़ने को मिला सच में बिना पाॅंखों का ।‌। -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 1050 – हार

मैं नहीं होता भयाकुल , पुण्य से ना पाप से ।। मैं नहीं रोता अयाचित , हर्ष या संताप से ।। मैं समय भी जीत लूॅं , मैं मृत्यु को भी मार दूॅं , किंतु मैं हारूॅं सदा अपनों से...Read more

[] नज़्म : 13 – बेवफ़ा

जो तूने बोए थे राहों में मेरी वो काॅंटे , उखाड़-उखाड़ के दरिया में आज फेंकूॅंगा ।। जो धूल ऑंखों में झोंकी थी फूॅंक-फूॅंक मेरी , वो झाड़-झाड़ के दरिया में आज फेंकूॅंगा ।। इरादतन जा ब जा सामने मेरे...Read more

मुक्तक : 1049 – सधी चाल

मैं लगता हूॅं यक़ीनन एक रोता खिलखिलाकर भी ।। लगूॅं डग-डग सधी ही चाल चलता लड़खड़ाकर भी ।। किसी के सख़्त ओ मज़्बूत शाने से खड़ा टिककर , नहीं गिरता मैं मैख़ाने से छककर पीके आकर भी ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 1048 – छुप-छुप

तिरछी नज़र से उसको कब तक निहारता ? छुप-छुप दरार से भी कितना मैं ताकता ? मुझको कभी न जिसने ऑंखों में ऑंख धर- देखा तो मैं भी कब तक उसको ही चाहता ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 1047 – क़ुसूर

हर वक़्त ही जो दिल के पास है वो जिस्म से ,             धरती से चाॅंद जितना बल्कि और दूर है ।।               ऑंखों की मेरी सुर्ख़ियाॅं ख़राबियाॅं नहीं ,   ...Read more