जो तूने बोए थे राहों में मेरी वो काॅंटे ,
उखाड़-उखाड़ के दरिया में आज फेंकूॅंगा ।।
जो धूल ऑंखों में झोंकी थी फूॅंक-फूॅंक मेरी ,
वो झाड़-झाड़ के दरिया में आज फेंकूॅंगा ।।
इरादतन जा ब जा सामने मेरे आ-आ ,
जमालो हुस्न जवाॅं रोज़ ही दिखा अपना ,
समा के पहले मेरी नीमबंद ऑंखों में ,
ख़ुद अपने वास्ते तूने ही बढ़ मोहब्बत का ,
चमन जो दिल की ज़मीं पर मेरी उगाया था ,
उसे उजाड़ के दरिया में आज फेंकूॅंगा ।।
ज़माने भर से बचा ऑंख बेशुमार मुझे ,
लिखे थे तूने जो गुज़रे किसी ज़माने में ,
न एक बार न सौ बार लाखों-लाख दफ़्आ ,
पढ़े थे मैंने न जाने कहाॅं-कहाॅं छिपकर ,
वो ख़त जो जान से ज़्यादा सॅंभाल रक्खे थे ,
उन्हें मैं फाड़ के दरिया में आज फेंकूॅंगा।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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