मुक्तक : 1051 – बता

बर्फ पर कभी-कभी , कभी धधकती आग में , पैनी-पैनी कीलों पर , कभी नुकीली सॉंग पर ।। कब खड़ा रहा न तेरे काम के लिए भला , सुब्हो शाम रात-दिन मैं सिर्फ़ एक टाॅंग पर ? कैसे कह गया...Read more