बर्फ पर कभी-कभी , कभी धधकती आग में ,
पैनी-पैनी कीलों पर , कभी नुकीली सॉंग पर ।।
कब खड़ा रहा न तेरे काम के लिए भला ,
सुब्हो शाम रात-दिन मैं सिर्फ़ एक टाॅंग पर ?
कैसे कह गया ये तू कि मैंने तुझको क्या दिया ?
तूने आज मेरी ऑंखों से लहू बहा दिया ।।
लाके पाॅंव में तेरे पटक दिए न कब बता ,
चाॅंद-सूर्य और सब सितारे तेरी माॅंग पर ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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