दरख़्तों के साए में दुनिया से छुपकर मैं कब से खड़ा हूॅं ?
निगाहें झुका सिर झुका बंदगी से अदब से खड़ा हूॅं ।।
वो दे देंगे आकर ख़ताओं पे मेरी मुआफ़ी मुझे बस ,
यही सोचकर इस क़रीने से मैं ऐसे ढब से खड़ा हूॅं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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