मैंने कुछ शेर शौक़ से अपने ,
घर के ऑंगन में पाल रक्खे हैं ,
जिनको ले जाके मैं चरोखर में ,
घास पत्ती हरी चराता हूॅं ।।
अपनी गायों को तुपनी भैंसों को ,
चंट बकरी को लंठ भेड़ों को ;
करके ख़ुद ही शिकार हाथों से ,
मांस-मछली पका खिलाता हूॅं ।।
हुक़्म मेंढक को दूॅं न भूल उछल ,
साॅंप से मैं कहूॅं कि सीधे चल ,
बोलूॅं गदहों से कूकना सीखें ,
रेंकना सीखें बुलबुल ओ कोयल ,
मैं कभी भी सड़क नहीं नापूॅं ,
पंख बिन मैं गगन उड़-उड़ मापूॅं ।।
मैंने देखा है स्वप्न कल ऐसा ,
ख़ुद को पानी पे मैं चलाता हूॅं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *