मुक्तक : 1052 – सुअर

दुखती हैं एड़ियाॅं औ’ तिस पे मोच पाॅंव में , चलता हूॅं जोंक-केंचुओं सा साल भर से सच ।। देखूॅं मैं चौंक -चौंक टकटकी लगा पड़ा , लॅंगड़े भी बढ़ रहे उधर उचक इधर से सच ।। दुनिया में सब...Read more