दुखती हैं एड़ियाॅं औ’ तिस पे मोच पाॅंव में ,
चलता हूॅं जोंक-केंचुओं सा साल भर से सच ।।
देखूॅं मैं चौंक -चौंक टकटकी लगा पड़ा ,
लॅंगड़े भी बढ़ रहे उधर उचक इधर से सच ।।
दुनिया में सब ही तो हैं बढ़ने बेक़रार से ;
चाहे हों चूहों , साॅंपों , लोमड़ी-सियार से ;
सोचूॅं भले न छोडूॅं पीछे इक हिरन को पर ,
आगे रहूॅं मैं कम से कम किसी सुअर से सच ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *