मुक्तक : 1061 – हरक़तें

कभी सूर्य के कान दोनों पकड़कर ,
उसे फूॅंककर फिर बुझा फिर जलाना ।।
कभी चाॅंद को मुट्ठियों में छुपाकर ,
अमावस में पूनम सा उसको दिखाना ।।
हथेली को अपनी बना शेष का फन ,
उठाया बहुत ग्लोब को एटलस बन ,
अजब हरक़तें थीं मेरी पागलों सी ,
रहा अब न बचपन गया वो ज़माना ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति