मुक्तक : 1065 – पागल

तनहाइयाॅं नहीं मैं मेलों में जा मुसलसल ,
हरगिज़ न सोचे कोई वो ही वो सोचता हूॅं ।।
बेकार ही न मुझको कहती है दुनिया पागल ,
पानी नहीं उसी जा , जाके मैं डूबता हूॅं ।।
ना खोदकर खदानें पन्ना की देखता मैं ,
ना ख़ाक गोलकुंडा की जा कुरेदता मैं ,
यूॅं ही से पत्थरों में एक एतबार लेकर ,
जा-जा कहाॅं-कहाॅं पर हीरे तलाशता हूॅं ।।
( तनहाइयाॅं=एकांत / मुसलसल=निरंतर / जा=स्थान / जा=पहुॅंचकर / एतबार=विश्वास )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति