मुक्तक : 1068 – लमलेट

थक के हम लमलेट झटपट पत्थरों पर हो गए ।।
और तिस पर फूलों के सपनों में जाकर खो गए ।।
बिस्तरों की हमने कब जानी ज़रूरत ; सच कहें –
नींद जब आयी , जहाॅं आयी , वहीं पर सो गए ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति