मुक्तक : 1071 – ज़बान

हुई जा रही थी ज़बाॅं धीरे-धीरे

कम अज कम तो गज़ भर ,

न जाती थी वापस बड़ी देर तक मुॅंह

में मुॅंह से निकल कर ।।

कई बार दाॅंतों से कटकर गिरी पर

किसी छिपकली की –

कटी दुम सी फिर ऊग आती थी मेंढक

के जैसी उछलकर ।।

वो करती थी बकवास बेबात की बात

सब से हमेशा ,

यक़ीनन अदब से बड़े क़ायदे और

ढब से हमेशा ,

ये मैं कब ? मेरे दोस्त कहते हैं मुझसे

तो अब मैंने इसको ,

है ताक़ीद कर दी रहे क़ैदे मुॅंह में

ही चुपचाप चलकर ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति