मुक्तक : 1073 – हवा में दौड़-भाग

लोगों ने ख़्वाब जब भी देखे तो नींद में ही ,
जब-जब भी देखे सपने तो जाग-जाग हमने ।।
ना हमने बारे जंगल , ना फसलें ही जलाईं ,
पानी में ही लगाई दिन-रात आग हमने ।।
मक़्सद बसा था दिल में , मंज़िल निगाहों में थी ,
लेकिन न जाने क्यों बस हर बार चाह कर भी ,
राहों पे एक भी डग अपना न भूल रक्खा ;
ठहरी हवाओं में ही की दौड़-भाग हमने ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति