∆ नज़्म – अदा

यूॅं हाथ आया बहुत कम ही मैं उनके सचमुच ,
मगर ; अगर मैं घिरा भी तो अदा से पूरी ।।
किसी को भी न ज़मीं पर या नज़र से हरगिज़ ,
हो इंतिज़ार सरेराह लुढ़क जाने का ,
मुझे पता है फिसलकर या बुरी ठोकर खा ,
मगर ; अगर मैं गिरा भी तो अदा से पूरी ।।
दग़ा किया है सरेआम उन्होंने मुझसे ,
वो बेवफ़ा हुए खा-खाके क़सम मुझ सर की ,
मैं मानता हूॅं बुरा है मुकरना वादे से ,
मगर ; अगर मैं फिरा भी तो अदा से पूरी ।।
निकालता है कोई इत्र तभी जब गुल में ,
न सिर्फ़ रंग हो बू हो ; हो उसमें शरबत भी ,
मैं जानता हूॅं नहीं मुझमें कोई भी ख़ूबी ,
मगर ; अगर मैं पिरा भी तो अदा से पूरी ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति