मुक्तक : 1074 – आदत

हमको आता है सचमुच मज़ा दोस्तों ,
जब मिलें ग़म पे ग़म , ग़म पे ग़म दम ब दम ।।
इस क़दर हम हैं रोने के आदी कि सच ,
हॅंसने की जगह भी खुलके रो-रो दें हम ।।
क्या यहाॅं , क्या वहाॅं सब जहाॅं में नहीं ,
हमसा पागल मिलेगा न ढूॅंढे कहीं ,
जो ; जहाॅं ढूॅंढते लोग ग़म में ख़ुशी ,
वो ख़ुशी में फिरे ढूॅंढता रंज-ओ-ग़म ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति