मुक्तक : 1075 – ख़ुदा

मेरे तो पाॅंव नीचे की ज़मीं ही खींच-खींच ले ,
तुझे बड़े-बड़े नये मकान पर मकान दे ।।
मुझे न दे वो सौ दफ़्आ भी माॅंगने पे चीज़ इक ,
अगर तू एक बार भी तलब करे तो जान दे ।।
बस एक ही सवाल दिल में बार-बार उठे बता ,
किया है तूने क्या सही व मैंने कौन की ख़ता ?
ख़ुदा तेरा मेरा जब इक तो क्यों वो तेरी चुप्पी भी –
सुने तुरंत पर मेरी पुकारों पे न कान दे ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति