मुक्तक : 1077 – तलाश ए रब

हो सके जो न उसके जिस्म के नज़ारों से ;
जल रहा था मैं उसके हुस्न की बहारों से ।।
जब न दीदार उसके हो सके तो की हमने ,
आख़िरश उसकी ताक-झाॅंक छिप दरारों से ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति