मुक्तक : 1078 – हॅंसी

नर्म गर्दन ज़मीं में हल सी धॅंसी जाती है ।।
ऑंख जालों में मकड़ियों सी फॅंसी जाती है ।।
जब भी हॅंसता है तो लगे है कि तू रोवे है ,
तेरे यों हॅंसने पे मुझे तो हॅंसी आती है ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति