मुक्तक : 1079 – ख़त

एक उसके सिवा न और किसी को देखूॅं ।।
दिल का सारा ग़ुबार सिर्फ़ उसी पे फेंकूॅं ।।
वो पढ़े लाख बार या न पढ़े एक दफ़्आ ,
ख़त पे ख़त उसको रोज़-रोज़ मैं लिख-लिख भेजूॅं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति