मुक्तक : 1080 – इंतज़ारी

आज तक आया न कोई ,

कल भी क्या आने की बारी ?

है न जाने फिर भी क्यों ; पर ,

मुद्दतों से इंतज़ारी ?

रहगुज़ारों पर बिछाए

रात – दिन बैठे हैं नज़रें ,

एक लोहे का यक़ीं ले ,

मोम सी इक बेक़रारी ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति