मुक्तक : 1081- कूद

कि ज्यों शिकार को बढ़ता है एक चीता यों ,
सॅंभल-सॅंभल के कब अपने क़दम रहा था बढ़ा ?
लटक के पेड़ पे नटखट से एक बंदर सा ,
उतरने को मैं कहाॅं , बल्कि कूदने को चढ़ा ।।
बस इस यक़ीं पे कि यारों ने है बिछा रक्खा ,
बहुत ही मोटा बहुत नर्म फूल सा गद्दा ;
मगर न भाॅंप सका उसके नीचे इक गहरा ,
उन्होंने खोद रखा था कुऍं समान गढ़ा !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति