मुक्तक : 1082 – रंजीदा

तुझको लेकर मैं संजीदा हूॅं आज भी ।।
बिन तेरे सख़्त रंजीदा हूॅं आज भी ।।
महफ़िलों में लगाऊॅं फ़क़त क़हक़हे ,
जबकि अंदर से नमदीदा हूॅं आज भी ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति