मुक्तक : 1083 – विचित्र बात

जो निभा रहा विशुद्ध मुझसे घोर शत्रुता ,
उससे प्राणपण से मात्र प्रीत कर रहा हूॅं मैं ।।
मित्र रोकते हैं किंतु उसका मन-हृदय न तक ,
रूप-रंग पर बुरी तरह से मर रहा हूॅं मैं ।।
मैं जो कर रहा हूॅं क्या वो कुछ विचित्र बात है ?
सत्य ही स्वयं के साथ छल या आत्मघात है ?
सोचते हुए ही आजकल झुका के अपना सिर ,
मंद गति से अपने पग डगर पे धर रहा हूॅं मैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति