मुक्तक : 1084 – चलनी

रो ले या गा ले जी भर , पिंजरे में क़ैद बुलबुल ,
परवाज़ भरने अपने , पर कैसे तोल सकती ?
जकड़ी हुई पड़ी है , ज़ंजीर में जो ख़ुद ही ,
कैसे गिरह किसी की , आख़िर वो खोल सकती ?
काना कहे तो कह ले , अंधे को अंधा फिर भी ,
कम बालों वाला कहले , गंजे को गंजा फिर भी ,
माना सुई में होता , सूराख़ पर बताओ ,
यह बात उससे कैसे , इक चलनी बोल सकती ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति