मुक्तक : 1088 – हॅंसी

कुछ इस अदा से , कहीं जब भी खड़ा होता हूॅं ,

लगे है ऑंख खुली रखके पड़ा सोता हूॅं ।।

नज़र किसी की न लग जाए ठहाकों को बड़े ,

हॅंसूॅं कुछ ऐसे कि जैसे मैं बड़ा रोता हूॅं ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति