मुक्तक : 1089 – आराम

रात-दिन मस्रूफ़िअत कुछ इस क़दर रहती ,
नींद के भी वक़्त अक्सर जागते रहते ।।
ज़िंदगानी की सड़क पर हर घड़ी सरपट ,
देखिएगा जब हमें तब भागते रहते ।।
हमको कब फ़ुर्सत मिले आराम की ख़ातिर ?
हम बने हैं दम ब दम बस काम की ख़ातिर ,
इसलिए मौक़ा अगर मिल जाए लम्हा भर ,
हम कहीं भी पड़के झपकी लागते रहते ।।

( मस्रूफ़िअत = व्यस्तता / दम ब दम = निरंतर )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति