मुक्तक : 1091 – वक़्त

गाहे-बगाहे बेघरों की इक पनाह था ।।
शाहों की भी कभी-कभार ऐशगाह था ।।
पाख़ाना उसको वक़्त ने बना के रख दिया ,
जो कमरा ; कब था कमरा ? एक ख़ानक़ाह था ।।
( पाख़ाना = शौचालय / ख़ानक़ाह = दरगाह , मठ )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति