मुक्तक : 1092 – कैसे ?

बिस्तर पे फूलों के पड़े आराम से कहो ,
काॅंटों की दास्ताॅं या ग़दर की कहानियाॅं !!
रहकर इधर औ’ सिर्फ़ इधर ही मगर अरे ,
जब-जब सुनाओ तब बस उधर की कहानियाॅं !!
कालिख से पोतना हो सफेदी को जिस तरह ;
हैरान हूॅं कि कैसे ? भला ! कैसे इस तरह ?
उखड़े हुए दरख़्तों के ठूॅंठों पे बैठ तुम ,
लिख लेते सायादार शजर की कहानियाॅं !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति