मुक्तक : 1093 – बतला

तेरे दाॅंतों में ज़ंजीरें कुतरने की भी ताक़त थी ,
भला क्यों रस्सियों के जाल में ख़ुद को जकड़वाया ?
तेरे हाथों में तलवारें थीं फिर भी क्यों रहा तू चुप ;
क्यों अपने काटने वालों की गर्दन काट ना पाया ?
न जाने क्या थी तेरी बेबसी , क्या राज़ था तेरा ;
तुझे छुड़वाने वालों ने ही तुझको आज आ घेरा ?
अरे बतला भी दे अब किस लिए तूने किया ये सब ;
तुझे तो शौक़ था जीने तब फिर ज़हर क्यों खाया ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति