मुक्तक : 1094 – आर्ज़ू

मुझको ग़ैरों ने खिलाया ज़ह्र ग़म ये ,
आर्ज़ू थी तेरे हाथों चाटता रे ।।
आख़िरश होना ही था मुझको क़लम पर ,
थी तमन्ना तू मेरा सर काटता रे ।।
मैं हिना हूॅं सब मेरा अंजाम जानें ;
रंग लाना ही मेरा बस काम मानें ;
मुझको सबने ही रगड़ कर ख़ूब पीसा ,
चाहता था दिल तू मुझको बाटता रे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति