मुक्तक : 1095 – सफलता

राह मेरी रही पग-पग , कंटकाकीर्ण-पथरीली ;
और सीधी नहीं डग-डग , छोर तक घोर सर्पीली ।।
मैं चला अनवरत-अनथक , इष्ट ऑंखों में अपना रख ;
देर से ; पर सफलता तो , अंततः मैंने पा ही ली ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति