इश्क़

तेरे कहने से दिन को दिन नहीं मैं रात कहता हूॅं ।।
तू ख़ुश हो इसलिए तो ग़मज़दा होकर भी हॅंसता हूॅं ।।
नहीं भाते जो वो सब काम भी बढ़-बढ़ तेरी ख़ातिर ,
किये जाऊॅं , किये जाऊॅं , ज़रा भी उफ़ न करता हूॅं ।।
न तेरा मातहत हूॅं मैं , न तू मेरा कोई अफ़सर ,
मगर तेरी हर इक ख़्वाहिश , तेरा हर हुक़्म सज़्दा कर ,
नहीं ! सचमुच नहीं मैं जानता क्या सोचकर लेकिन ,
क़सम से खेल कर जाॅं पर बजा लाता हूॅं मैं अक़्सर ।।
ग़ुलामी यों भला मग़रूर होकर कौन करता है ?
कहा करते हैं सब मुझसे नहीं यह इश्क़ फिर क्या है ?
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति