मुक्तक : 1097 – क्यों ?

रात दिन सोचूॅं कि आख़िर कब हुआ और क्या हुआ ?
मेरी बर्बादी का सुन किस्सा वो क्यों उट्ठा चहक ?
इक दफ़्आ भी उसकी ऑंखें सख़्त हैराॅं हूॅं कि क्यों ,
देखकर मुझको सुबकते टुक नहीं आयीं छलक ?
ग़ैर जो हरगिज़ नहीं जो बल्कि था अपना मेरा ;
और दुश्मन भी नहीं जो दोस्त था पक्का मेरा ;
जो छिड़कता मुझपे था दौलत , दिलो-जाॅं कल तलक ,
आज उसी ने ज़ख्मों पे मरहम न मल छिड़का नमक !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति