अज़्म ( संकल्प )

जीने की ख़ातिर रोज़ मरूॅं –
मैं कितनी बार , मगर मुझको ,
महबूब क़सम अच्छा लगता ,
जीना , जीना और बस जीना ।।
जीना , जीना और बस जीना ।।
मैं प्यार में अंधा हो उसके ,
तैयार रहा सब लुटवाने ,
कर-करके दग़ा जिसने मुझसे ,
छीना , छीना और बस छीना ।।
छीना , छीना और बस छीना ।।
उसकी यादों में , जो न रहा –
अब मेरा , यहाॅं तक ग़ैर हुआ ,
खाना छोड़ा , जारी रक्खा –
पीना , पीना और बस पीना ।।
पीना , पीना और बस पीना ।।
उसका है काम मुझे देना ,
ज़ख्मों पे ज़ख़्म जहाॅं तक हो ,
मेरा भी अज़्म , उन्हें , कुछ हो ,
सीना , सीना और बस सीना ।।
सीना , सीना और बस सीना ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति