मुक्तक : 1098 – क़दम

जिस्म मेरा , मेरा दिल और रूह भी मेरी चले ,
तुझ तलक बिन पैर के ही और बिन पंखों के उड़ ।।
जिस्म से तेरे , तेरे दिल और तेरी रूह से ,
रात-दिन तीनों मचलकर इस क़दर जाने को जुड़ ।।
जैसे राॅंझा ; हीर से मिलने को तड़पा था कभी ,
क़ैस ; लैला के लिए सहरा में भटका था कभी ,
हाॅं ! बढ़ें मेरे क़दम आगे मगर तू देखना ,
तू जहाॅं हो उस तरफ़ देखूॅं मैं बारंबार मुड़ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति