मुक्तक : 1099 – चल बैठा

लतीफ़े सुन रहा था और हॅंस-हॅंसकर परेशाॅं था ,
यक़ायक़ याद वो आया कि रोये-रोये चल बैठा ।।
अमा की रात को जो चाॅंद सा खोया उसे पाने ,
लिए सूरज को हाथों में मैं खोये-खोये चल बैठा ।।
न काशी में न मथुरा में , न मक्का औ’ मदीने में ;
बग़ैर उसके नहीं लगता कहीं जी अब तो जीने में ;
ज़रा सी ऑंख लगते ही जो ख़्वाब आया तो वो मुझको ,
बुलाने तुल गया तो हाय ! सोये-सोये चल बैठा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति