मुक्तक : 1100 – हालात

वहाॅं पर लेटकर हमने बहुत आराम फ़रमाया ,
जहाॅं तशरीफ़ रखना भी लगे दुश्वार लोगों को ।।
बहुत ही तंदुरुस्ती से रहे बरसों वहाॅं पर हम ,
जहाॅं दो साॅंस लेना भी करे बीमार लोगों को ।।
कि जितनी जा लगे मुर्दे को दफ़नाने में कम से कम ,
रहे हैं मुद्दतों उतनी जगह ही घर बनाकर हम ,
हमारे देखकर हालात , सुनकर दास्ताने ग़म ,
तरस फिर भी न आए हाय रे ख़ूॅंख़्वार लोगों को !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति