तक़्दीर का मारा

कितना तक़्दीर का मारा हूॅं ; सच ! बिचारा हूॅं ?
जिसकी लज़्ज़त का न सानी जहान में होगा ,
ज़ाइक़ा जिसका ज़ुबाॅं को मेरी पसंद रहा ,
जिसको खाना था मुझे ठूॅंंस-ठूॅंंस कर यारों ,
हाय बदबख़्त उसे चख तलक न पाया मैं ।।
जिसको बाहों में जकड़ने की आर्ज़ू पाले-
इश्क़ में जिसके गिरफ़्तार हो रहा सालों ,
रूबरू जब वो मेरे हो गया तो क्या बोलूॅं ?
ऑंख उठा उसको सही लख तलक न पाया मैं ।।
मैंने लिक्खे जो उसे रात-रात भर जग-जग ,
ख़ून से अपने कई ख़त सड़क से भी लंबे ,
उसने भी सबके दिए थे जवाब दिलख़ुशकुन ,
हाय ! उनको भी सॅंजो रख तलक न पाया मैं ।।
( ज़ाइक़ा = स्वाद / लख = निहारना / बदबख़्त = अभागा / दिलख़ुशकुन = आनंददायक )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति