जाने क्यों ?

जाने कब से , जाने किसको , जाने क्यों मैं ढूॅंढता हूॅं ?
हर कली के लब तबस्सुम को रहे हैं आज़मा ;
क़हक़हों में फूल डूबे करके ग़म का ख़ात्मा ;
हर तरफ़ बिखरा हुआ है ख़ूबसूरत वो समा ;
तक रहा हर शख़्स जिसको अपनी ऑंखों को थमा ;
बस अकेला मैं नज़ारा टुक नहीं ये देखता हूॅं ?
जाने कब से , जाने किसको , जाने क्यों मैं ढूॅंढता हूॅं ?
चलते-चलते हो गया था हादसा उस दिन बड़ा ;
मौज में आकर सफ़ीना खाके हिचकोले अड़ा ;
हर कोई ख़ुद को बचाने को दिल ओ जाॅं से लड़ा ;
लग गए सारे किनारे जिस तरह भी बन पड़ा ;
मैं अभी तक भी भॅंवर में धीरे-धीरे डूबता हूॅं ?
जाने कब से , जाने किसको , जाने क्यों मैं ढूॅढता हूॅं ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति