मुक्तक : 1101- वक़्त

जिस तरह भी बन पड़ा पर दिल पे रखकर ,
फ़िक्र का एक-एक पर्वत ढो दिया है ।।
कट चुके हाथों को जुड़वाने से अब क्या ,
जो भी करना था वो सब कर तो दिया है ?
एहतियातों में या लापरवाहियों में ,
पास जितना भी था लेकिन धीरे-धीरे ,
मुट्ठियों में कसके पकड़ी रेत जैसा ,
मैंने अपना वक़्त सारा खो दिया है ?
– डॉ. हीरालाल प्रजापति