मुक्तक: तब्दीलियाॅं

होके मछली ज़मीं पे दौड़ूॅं मैं ,
बनके हाथी मैं उछलूॅं मेंढक सा ।।
बाज से पंख रख भी रेंगूॅं मैं ,
साॅंप होकर भी मैं चलूॅं सीधा ।।
क्या बताऊॅं कि देखकर तुझको ,
जाने हो जाए है रे क्या मुझको ?
ऐसी तब्दीलियाॅं चली आऍं ,
ग़म का मारा भी मैं लगूॅं हॅंसता ।।
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति