आख़िर क्यों ?

न था मुझमें कुछ ऐसा जिस पर किसी का ,
मुझे ऐसा लगता है दिल आ भी सकता ।।
ज़माना तो बस ख़ूबरुई का आशिक़ ,
उसे कोई बदरू ज़रा भा भी सकता ?
न नीली , न गहरी , न हरगिज़ नशीली ,
मेरी ऑंखें हर वक़्त रहतीं जो गीली ,
अरे कोई ढूॅंढे भी क्या कोई इनमें ,
कहीं कोई जादू भला पा भी सकता ?
मगर वह जो अब पास मेरे नहीं हैं ,
बहुत पहले ही छोड़कर चल दिए जो ।।
मेरे सामने हर घड़ी रहने वाले ,
यक़ायक़ ही मुॅंह मोड़कर चल दिए जो ।।
रहा जब तलक साथ थे साथ जिनका ,
मेरा हाथ थामे रहा हाथ जिनका ,
जो रिश्ता बनाया था ख़ुद किस ख़ता पर –
मेरी जाने बस तोड़कर चल दिए जो ।।
मेरा क़द ज़रा भी ना खंभा था लेकिन ,
कुतुब वाली मीनार कहते रहे वो ।।
फ़क़त डेढ़ बीते की एक भीत भर था ,
मगर चीनीदीवार कहते रहे वो ।।
मेरे श्याम रॅंग को वो राधा सा गोरा ,
लपट-लू को शीतल पवन का झकोरा ,
मेरी एक खटारा पड़ी साईकिल को ,
बड़ी लग्ज़री कार कहते रहे वो ।।
-डॉ.हीरालाल प्रजापति