मुक्तक : थम गया

मुझे खौलने की ही आदत पड़ी थी ,
हिमालय सा मैं एकदम जम गया हूॅं ।।
उसे देखने को न उड़ती नज़र भी ,
नहीं चाहकर भी अरे थम गया हूॅं ।।
वो आलम , वो मौसम , समा वो ग़ज़ब था ,
मेरा उसका मिलना भी सचमुच अजब था ,
मैं जिसका लगा ना कभी दिल कहीं भी ,
वो मीरा सा ज्यों कृष्ण में रम गया हूॅं ।।
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति