मुक्तक : ख़ुद्दारी

वो मुझे दुत्कार कर अक्सर भगाते थे ,
दुम हिलाता मैं वहीं फिर भाग आता था ।।
वह हमेशा फेंककर देते मुझे जूठन ,
मुझको लगता था मैं छप्पन भोग पाता था ।।
मत समझना मुझ में ख़ुद्दारी नदारद थी ;
हाॅं मगर उनसे मोहब्बत हद से ज़ायद थी ;
इस क़दर मैं इश्क़ में उनके रहा ग़ाफ़िल ,
जिनकी ऑंखों को न फूटी ऑंख भाता था !!
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति