क्यों ?

सच कह रहा हूॅं चाहे , मानो या तुम न मानो ,
पैरों पे मेरे गिरकर , रो- रो औ गिड़गिड़ाकर ,
भर दोपहर स्वयं आ , चुपके से डरते-डरते ,
पानी ने मुझसे थोड़ा , पीने को पानी माॅंगा ।।
उसने जो सबको चंगा , नहला-धुला के रखता ,
उसने जो कंठ जग का , करता है तृप्त मुझसे ,
कर स्तब्ध और विस्मित , यद्यपि हाॅं स्वप्न में आ ,
पर क्यों कल एक चुल्लू , जीने को पानी माॅंगा ?
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति