मुक्तक : मील का पत्थर

अजनबी क्या , ग़ैर क्या , दुश्मन तलक जाकर ,
गर मैं चाहूॅं तो यक़ीं कर , जुड़ भी सकती है ।।
जो चला करती है सीधी राह ही लेकिन ,
मैं जो बोलूॅं , रुक भी सकती , मुड़ भी सकती है ।।
ये तो मर्ज़ी है मेरी , जो मील का पत्थर ,
बन गड़ा बैठा तेरी रह के किनारों पर ,
वर्ना तुझ बिन ज़िंदगी , ताज़िंदगी मेरी ,
सिर्फ़ चल सकती नहीं , ये उड़ भी सकती है ।।
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति