मुक्तक : नाचीज़

अब तेरी नज़रों में मैं कुछ भी नहीं ,
तू निगाहों को मेरी नाचीज़ है ।।
ना मैं तेरी कामयाबी की दुआ ,
ना तू मेरे मर्ज़ का ताबीज़ है ।।
हममें-तुममें प्यार अगर होता बचा ,
अब भी इक-दूजे के हम रहते ख़ुदा ,
ना तेरे सर टेकने का दर मैं अब ,
ना मेरे सज़्दे की तू दहलीज़ है ।।
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति