ग़म

उससे बिछड़े यों कई साल हुए जाते थे ,
उससे दूरी का मगर सख़्त अभी भी ग़म था ।।
शादमाॅं जितना न उससे मैं हुआ था मिलके ,
उतना ज़्यादा हो अलग उससे हुआ मातम था ।।
बेवफ़ा भी वो न था और न फ़रेबी लेकिन ,
मैंने इल्ज़ाम उसे ये ही दिए सर गिन-गिन ,
जबकि याद उसकी लगातार मुझे आती थी ,
फिर भी ऑंखों को मेरी मैंने किया कब नम था ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति