मुक्तक : 1044 – बदला

बद्दुआ निकले है मेरे दिल से ये ही आजकल ; इश्क़ में लग जाए ऐसी आग वो बस जाए जल ।। कोयला उसने मुझे हीरे से करके रख दिया , मैं भी चाहूॅं वो भी ज़र से जाए मिट्टी में...Read more

मुक्तक : 1043 – पलटा

जाने क्या हासिल हुआ या खो गया या छिन गया , तर्ज़ो अंदाज़ आजकल सब खा गया पलटा मेरा ? पाॅंवों से करता हूॅं अपने सब के सब ही काम मैं , कारवाॅं दिन-रात अनथक हाथों से चलता मेरा ।।...Read more

मुक्तक : 1042 – क्यों ?

गंगा की धार में कुछेक मोड़-माड़कर , मुट्ठी में दाबे तैरकर बहाने को चला ।। जलती चिता में बच गए वो फाड़-फूड़कर , थैले में रख दबा-छुपा जलाने को चला ।। जाॅं से कहीं ज़ियादा जो सॅंभाल कर रखे ;...Read more

मुक्तक : 1041 – पत्थर

पत्थर हूॅं पड़ा सोचूॅं कि मैं चल जाऊॅं ।। पानी हूॅं मगर चाहूॅं कि मैं जल जाऊॅं ।। दलदल से निकल जाने की मेरी कोशिश , हाथी की तमन्ना जैसे उछल जाऊॅं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 1040 – नक़ाब

डर , उनके हुक़्म से उन्हीं के रोब ओ दाब से ।। चेहरा छुपा दिखा दिया हमने नक़ाब से ।। अफ़्सोस है कि जिनकी हम नज़रों में कल तलक , थे आफ़्ताब हो गए अब माहताब से ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

∆ ग़ज़ल : 307 – मैं ही जानता हूॅं

इस बात को फ़क़त मैं ही जानता हूॅं यारों ।। गिर-गिर के ही मैं इतना ऊॅंचा उठा हूॅं यारों ।। धोखा किया है उनसे मैंने ही पर मुझे वो , जानूॅं न क्यों न माने मैं बेवफ़ा हूॅं यारों ?...Read more